पुरानी दिल्ली का भूतिया घर

haunted house


मेरा नाम दीपक है। आज मैं आपको अपने साथ घटी एक सच्ची घटना के बारे में बताना चाहता हूं। हो सकता है आप लोगों को ये सब इतना डरावना न लगे, लेकिन मेरे लिए वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे खौफनाक दिन था।
मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूं, लेकिन नौकरी के लिए छत्तीसगढ़ में रहता था। वहां एक टेलीकम्युनिकेशन कंपनी में फील्ड टेक्नीशियन के तौर पर काम करता था। मेरा काम था जब भी कंपनी के किसी मोबाइल टावर में कोई तकनीकी समस्या आती तो मुझे जाकर उसे ठीक करना होता। मेरे जिम्मे जो इलाके थे, वो सब शहर से दूर जंगलों और छोटे इलाकों में स्थित थे।
एक दिन मेरे मैनेजर ने बताया कि शहर से बाहर एक टावर में समस्या आ रही है। सिग्नल तो आ रहे हैं, लेकिन उनकी फ्रीक्वेंसी बार-बार टूट रही है। मुझे वहां जाकर इसे ठीक करना था। मेरे लिए ये रोजमर्रा का काम था, इसलिए मैंने तुरंत हां कर दी। वो इलाका महासमुंद जिले के अंतर्गत आता था।
मैं पहले भी कई बार उस इलाके में जा चुका था लेकिन उस दिन जिस खास जगह जाना था, वहां पहले कभी नहीं गया था। कंपनी की तरफ से मुझे एक बोलेरो जीप मिली हुई थी ताकि मैं दूरदराज के इलाकों में जा सकूं।
उस दिन भी हमेशा की तरह मैं अपनी गाड़ी में सारे उपकरण रखकर निकल पड़ा। शहर से बाहर निकलते ही करीब एक घंटे तक रास्ता मुझे परिचित लगा। लेकिन फिर जीपीएस ने मुझे जंगल के भीतर एक कच्चे रास्ते पर ले जाया। ये इलाका मेरे लिए बिल्कुल नया था। कुछ देर बाद ही जीपीएस ने भी काम करना बंद कर दिया। मैं समझ गया कि अब मैं उस इलाके में पहुंच गया हूं जहां खराब टावर के सिग्नल से समस्या आ रही थी।
मेरे पास इलाके का एक फिजिकल मैप भी था और रास्ता भी ज्यादा मुश्किल नहीं लग रहा था। करीब 20 मिनट बाद मैं एक पुराने लोहे के बड़े से गेट के सामने पहुंचा जो पूरी तरह जंग खाया हुआ था। देखने से ही लग रहा था कि उसे सालों से इस्तेमाल नहीं किया गया है। आगे बढ़ने के लिए मुझे वो गेट खोलना था। मैंने गाड़ी से उतरकर गेट खोलने की कोशिश की। उसकी हालत देखकर लग रहा था कि कहीं वो मेरे हाथ लगाते ही गिर न जाए।
लेकिन गेट आराम से खुल गया। गेट के आगे जो इलाका था वो पूरी कंपनी की प्रॉपर्टी थी। हालांकि वो भी जंगल की जमीन थी, लेकिन उसे कंपनी ने खरीद रखा था।
वहां से मैं जीप लेकर आगे बढ़ा तो कुछ ही दूरी पर मुझे रिले स्टेशन दिख गया। वहीं पर वो टावर था जिसमें समस्या आई थी। टावर के चारों तरफ मोटी चेन से फेंसिंग की गई थी।
वहां तक पहुंचते हुए मुझे एक अजीब सी गंध आ रही थी, जैसे गंदे पानी में कुछ सड़ रहा हो। शायद जंगल में कोई जानवर मरा होगा या पता नहीं किस चीज़ की बदबू थी। लेकिन उस रिले स्टेशन के पास कोई बदबू नहीं थी। सब कुछ शांत था। सिर्फ बीच-बीच में जंगल के पक्षियों की आवाजें आ रही थीं।
मैं जीप से उतरकर आगे गया तो देखा कि फेंस के गेट पर लगा ताला टूटा हुआ था। मैंने सोचा वापस जाकर इसकी रिपोर्ट कर दूंगा। फिर मैं टावर पर लगी सीढ़ी से ऊपर चढ़ा और वहां लगे ट्रांसमिटर्स वगैरह का इंस्पेक्शन करने लगा। सबकुछ ठीक ही लग रहा था।
मैं धीरे-धीरे हर चीज़ की जांच अपने टूल्स की मदद से कर रहा था। करीब एक घंटा बीत गया। इस बीच मैं अपने काम में इतना खो गया था कि आस-पास जो हो रहा था उस पर मेरा ध्यान ही नहीं गया। न ही मुझे कोई आवाज़ सुनाई दी।
फिर लगभग एक घंटे बाद जब मैं नीचे उतरा तो देखा कि मेरी जीप वहां नहीं थी। ये देखते ही मेरी जान एक पल के लिए निकल गई। लेकिन तभी मुझे याद आया कि मैंने जीप कुछ कदम दूर पेड़ों के पीछे की तरफ खड़ी की थी।
अचानक मुझे बहुत सुकून मिला और अपने ऊपर हंसी भी आ गई कि मैं इतनी छोटी सी बात पर डर गया। मैं अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ ही रहा था कि तभी मैंने एक अजीब सी चीज़ नोटिस की। मैंने देखा कि जमीन पर कुछ नंगे पैरों के निशान थे… छोटे-छोटे कदमों के निशान, जैसे किसी बच्चे के पैर हों।
लेकिन ये बच्चे के पैर नहीं थे, क्योंकि आकार में तो छोटे थे लेकिन बेहद भारी लग रहे थे, जैसे किसी बोंय व्यक्ति के पैर हों। हो सकता है कोई बच्चा ही हो, क्योंकि सिर्फ निशान देखकर पता लगाना मुश्किल था।
मुझे हैरानी हो रही थी, क्योंकि अभी कुछ ही देर पहले जब मैं यहां आया था तब तो ऐसे कोई निशान नहीं थे। ये निशान अचानक कहां से आ गए? ये जगह तो ऐसी है कि यहां शायद ही कोई आता हो।
खैर, मैंने सोचा जो भी है, मुझे तो यहां से जल्दी निकलना चाहिए। मैं तेज़ी से अपनी जीप के पास पहुंचने लगा। मेरी जीप मुश्किल से 20 कदम दूर थी लेकिन वहां जाते हुए ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी अंधेरी खाई में जा रहा हूं।
जैसे बचपन में अंधेरे में बिस्तर पर जाते वक्त लगता है कि नीचे से कोई चीज़ झपट पड़ेगी। आपको भी पता होता है कि ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन मन में वहम तो रहता ही है। मैं भी जानता था कि यहां मेरे अलावा कोई नहीं है, लेकिन फिर भी बीच-बीच में पीछे मुड़कर देख रहा था।
कुछ ही सेकंड में मैं अपनी जीप के पास पहुंच गया। तब देखा कि जमीन पर जीप के टायरों के निशान ऐसे बने हुए थे जैसे किसी ने धक्का देकर उसे आगे सरकाया हो। ऊपर से मैंने नोटिस किया कि जीप का एंगल भी बदला हुआ था। जिस तरह मैंने उसे खड़ा किया था अब वो वैसे नहीं खड़ी थी।
पहले वो जमीन पर कदमों के निशान और अब ये सब… ये मेरा वहम नहीं था। यहां जरूर कोई था जो ये सब हरकतें कर रहा था। शायद आसपास के आदिवासी बच्चे होंगे या फिर कोई नशेड़ियों का समूह होगा। मैं मन ही मन सोच रहा था।
गाड़ी के साथ कोई और छेड़छाड़ तो नहीं हुई लग रही थी। मैंने जल्दी से जीप में बैठकर उसे स्टार्ट किया। जीप आसानी से स्टार्ट हो गई।
फिर मैंने तेजी से गाड़ी घुमाई और वहां से निकलने लगा। लेकिन आगे बढ़ते हुए रियर व्यू मिरर में मुझे पेड़ों के बीच कोई खड़ा दिखा। साफ नहीं दिख रहा था, लेकिन वहां कोई था।
एक पल के लिए सोचा रुक कर देखूं कि ये कौन है। लेकिन फिर सोचा कि बेवजह के झंझट में क्यों पड़ना, मेरा काम तो हो ही गया है। जल्दी से यहां से निकल जाता हूं।
लेकिन जैसे ही मैं उस बाहर वाले गेट पर पहुंचा तो देखा कि वो गेट बंद था और किसी ने उसमें ताला लगा दिया था।
ये ताला किसने लगाया? मैं तो गेट खुला छोड़कर अंदर आया था। आसपास कोई भी नजर नहीं आ रहा था। ये क्या मुसीबत है!
अब मुझे बहुत फ्रस्ट्रेशन हो रही थी, गुस्सा भी आ रहा था। मैंने जीप से उतरकर उस लॉक को चेक किया। वो ताला बहुत मजबूत था..
अब मैं क्या करूं… क्या करूं? ताला तोड़ना पड़ेगा। मैं जल्दी से अपने टूलबॉक्स में कोई ऐसी चीज़ ढूंढने लगा जिससे वो लॉक तोड़ा जा सके।
मैं टूलबॉक्स में खोज ही रहा था कि तभी पीछे पेड़ों से एक अजीब सी आवाज़ आई। मैंने झट से पलट कर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। सच बताऊं तो वो पल ऐसा था जब मुझे सच में बहुत डर लगने लगा।
अंधेरा भी होने वाला था। कहीं कोई नक्सली वगैरह तो नहीं छिपे हों जो मुझे पकड़ने की फिराक में हों? अब तो डर और भी ज्यादा बढ़ गया था। मैंने कहा, “भाड़ में जाए टूलबॉक्स! इस गेट को ही तोड़ देता हूं।”
ये सोचकर मैं तुरंत जीप में बैठा और गियर लगाकर रेस दे ही रहा था कि टायर आगे बढ़े ही नहीं। टायर वहीं के वहीं घूमने लगे। अब इसे क्या हो गया?
“साला, आज का दिन ही खराब है। पता नहीं मैं इस मनहूस जगह पर क्यों आ गया?”
मैं फिर से जीप से उतरकर टायर चेक करने लगा। देखा तो टायर मिट्टी पर फिसल रहा था और वहीं घूम रहा था। हर बीतते पल के साथ मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। ये सब बिलकुल भी सामान्य नहीं था।
इतनी सारी चीज़ें एक साथ नहीं हो सकतीं। और तभी मुझे पीछे से तेज़ कदमों की आवाज़ आई और नजर के कोने से कुछ जाता हुआ दिखा। साफ तो कुछ नहीं दिखा, लेकिन वहां पक्का कोई था। इंसान नहीं, बल्कि कुछ और…
“ओए! कौन है वहां?” मैंने आवाज़ लगाई। मैं बहादुर बनने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अंदर से इतना डरा हुआ था कि बयान नहीं कर सकता।
कोई जवाब नहीं आया। ऊपर से फोन में सिग्नल भी नहीं आ रहे थे। मैं मन ही मन भगवान को याद करने लगा, “हे भगवान! आज बचा ले… बस आज बचा ले।”
तभी वो आवाज़ आई, “चला जा यहां से!”
बहुत ही भारी सी आवाज़, किसी आदमी की।
“कौन है… कौन है वहां?” मैंने कहा। “मैं तो जाना ही चाहता हूं, लेकिन तू मुझे जाने तो दे साले!” मैं मन ही मन सोच रहा था।
मैंने पिछले टायर के नीचे कुछ पत्थर डाले और फिर से भगवान का नाम लेते हुए गाड़ी स्टार्ट की। इस बार टायर निकल गया। लेकिन आगे वो गेट अभी भी बंद था।
“भाड़ में जाए गेट! जान से बढ़कर क्या है?” मैंने पूरी स्पीड में रेस दी और उस गेट को टक्कर मार दी।
मुझे पूरा यकीन था कि बोलेरो उस जंग लगे गेट को आसानी से तोड़कर निकल जाएगी। और हुआ भी ऐसा ही। बोलेरो पूरी स्पीड में गेट को उड़ाते हुए बाहर निकल गई।
मैंने जैसे-तैसे गाड़ी को कंट्रोल किया। नहीं तो वो आगे पेड़ों में ही घुस जाती। अब बस मुझे वहां से जल्द से जल्द निकलना था।
लेकिन जैसे ही मैं उस गेट से बाहर निकला, मुझे फिर से किसी ने आवाज़ दी, “अबकी बार आया तो जिंदा नहीं बचेगा!”
और इस आवाज़ के साथ ही मेरी गाड़ी में ऐसा धक्का लगा जैसे पीछे से कोई भारी चीज़ आकर टकराई हो। उस वक्त मेरी जान हलक में ही अटक गई। लेकिन मैं रुका नहीं।
रियरव्यू मिरर में देखने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी। बस मैं गाड़ी भगाता रहा, तब तक जब तक उस जंगल से बाहर नहीं निकल गया।
वहां से सीधा मैं अपनी कंपनी के ऑफिस पहुंचा और अपने मैनेजर को सारी बात बताई। उसने मेरी पूरी बात सुनी लेकिन उसके चेहरे से लग रहा था कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ा।
वो बोला, “कोई बात नहीं। तुम ठीक-ठाक आ गए हो ना? अब आराम से घर चले जाओ।”
इसके बाद घर जाते हुए मैं सोच रहा था कि शायद मैनेजर की बात सही भी है। शायद मैं बिना वजह ही इतना डर गया था।
लेकिन फिर वो सब जो हुआ, वो क्या था? वो कदमों के निशान… किसी का मुझे आवाज़ देना… ये सब मेरा वहम नहीं था।
शायद उस जंगल के इलाके में कोई ऐसी चीज़ थी जो मेरी जान तो नहीं लेना चाहती थी, लेकिन वो चाहती थी कि कोई उसके इलाके में ना आए।
शायद इसलिए ही वो मुझे डरा कर वहां से भगाना चाहती थी। खैर, जो भी था… लेकिन ये सच है कि वो मेरी जिंदगी का सबसे डरावना दिन था।

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मेरा नाम अनामिका है। मैं मध्य प्रदेश की रहने वाली हूं लेकिन अभी हम लोग महाराष्ट्र में रह रहे हैं। आज मैं आपको अपनी मम्मी के साथ घटी एक सच्ची घटना के बारे में बताने जा रही हूं।
यह बहुत साल पहले की बात है। मम्मी तब छोटी ही थीं। उन दिनों वे लोग मध्य प्रदेश के एक गांव में रहते थे। उन दिनों मम्मी की मौसी के गांव में हर साल मेला लगता था।
एक बार ऐसा हुआ कि मम्मी मेला शुरू होने से एक-दो दिन पहले ही अपनी मौसी के घर गई थीं। उनकी मौसी के दो बेटे थे और उस वक्त धान कटाई का समय चल रहा था। मतलब यह कि सितंबर के आसपास की बात थी। हल्की-हल्की ठंड भी शुरू हो चुकी थी।
उन दिनों गांव में लोग सुबह-सुबह ही अपने खेतों में काम करने चले जाते थे। तो एक दिन मौसी ने सभी बच्चों से कहा कि “जो भी कल सुबह सबसे पहले खेत में जाकर अपना काम खत्म करेगा, वही शाम को सबसे पहले मेले में जाएगा।”
उनकी मौसी का खेत गांव के बाहरी इलाके में था, इसलिए वह इलाका सुबह-शाम बिल्कुल सुनसान रहता था। आसपास कोई दिखाई नहीं देता था।
उस दिन सुबह-सुबह करीब 5 बजे सभी बच्चे अपनी-अपनी साइकिल लेकर खेत जाने के लिए निकल गए। लेकिन रास्ते में ऐसा हुआ कि उनके दोनों कज़िन आगे निकल गए और मम्मी की साइकिल पीछे रह गई।
मम्मी को खेत का रास्ता पता था, इसलिए वे अकेले ही साइकिल चलाते हुए खेत की तरफ जाने लगीं। लेकिन फिर कुछ दूर जाते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनकी साइकिल के पीछे बैठ गया हो।
अचानक साइकिल बहुत भारी लगने लगी। उन्होंने पीछे मुड़कर भी देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। उन्हें लगा कि शायद ठंड का मौसम है और सुबह-सुबह का वक्त है, इसलिए ऐसा लग रहा होगा।
यह सोचकर उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और साइकिल चलाती रहीं। लेकिन बीच-बीच में उन्हें साइकिल बहुत भारी महसूस हो रही थी।
जब भी वे पीछे मुड़कर देखतीं तो वहां कोई नहीं होता। मम्मी को साइकिल चलाने में काफी परेशानी हो रही थी लेकिन उन्होंने डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
अब ऐसा करते-करते वे गांव के बाहर श्मशान घाट के पास पहुंचने वाली थीं। श्मशान घाट से कुछ कदम आगे एक पुल था जिसे पार करके खेत जाना होता था।
जैसे ही मम्मी उस श्मशान घाट के पास पहुंचीं, अचानक उनकी साइकिल का टायर अपने आप फिसल गया। मम्मी सीधे उस पुल की तरफ गिर गईं।
लेकिन मम्मी फिर भी नहीं डरीं। उन्होंने अपनी साइकिल उठाई और पुल पार करने लगीं। उस वक्त भी उन्हें साइकिल बहुत भारी महसूस हो रही थी।
जैसे ही वे उस पुल के बीचोंबीच पहुंचीं, अचानक उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनकी साइकिल से कूदा हो। उसी समय नीचे नदी में किसी के कूदने की आवाज़ आई।
ऐसा लगा जैसे कोई उनकी साइकिल से उतरकर नीचे नदी में कूद गया हो। पानी में गिरने की तेज़ आवाज़ भी आई थी।
इसके साथ ही मम्मी की साइकिल बिल्कुल हल्की हो गई, जैसे जो भी उनकी साइकिल पर बैठा था वह अब उतर गया हो।
इसके बाद मम्मी सीधे अपनी साइकिल भगाती हुई खेत पहुंचीं और सबको यह बात बताई। उनकी मौसी ने यह सुनकर कहा, “यह पक्का कोई ऊपरी हवा थी जो तुम्हारे साथ लग गई थी।” लेकिन तुमने अपने मन में डर को हावी नहीं होने दिया, इसलिए वह चीज़ तुम पर काबू नहीं पा सकी और उसने अपना रास्ता बदल लिया। नहीं तो वह तुम्हारे पीछे-पीछे घर तक आ जाती।

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मेरा नाम इफ़रा है। आज मैं आपको अपनी फैमिली के साथ घटी एक घटना के बारे में बताने जा रही हूं। इन सब चीज़ों की शुरुआत होती है साल 1999, जनवरी से, जब मेरे दादा ने एक नया घर खरीदा था। उस समय तक मेरे पापा की शादी नहीं हुई थी, लेकिन उनकी सगाई हो चुकी थी।
इससे पहले वे जिस घर में रहते थे, वहां मेरे दादा-दादी, पापा, चाचा और बड़े पापा यानी ताऊजी-ताईजी सभी एक ही घर में रहते थे। उस घर में सिर्फ दो कमरे थे, इसलिए पापा की शादी के लिए दादा ने यह नया घर खरीदा ताकि शादी के बाद पापा उस नए घर में रह सकें। यह घर हमारे पुराने घर से 15 मिनट की वॉकिंग डिस्टेंस पर था।
फिर अप्रैल 1999 में पापा-मम्मी की शादी हो गई, जिसके बाद मम्मी उस नए घर में आकर रहने लगीं। दादी पहले ताऊजी के घर में रहती थीं, इसलिए नए घर में उनका मन नहीं लगता था और वे ज्यादातर पुराने घर में ही रहती थीं।
इधर पापा और दादा वगैरह सुबह 11 बजे तक अपनी दुकान पर चले जाते थे और फिर रात 9 बजे तक घर वापस आते थे। इस बीच मम्मी घर में बिल्कुल अकेली रहती थीं। जैसा कि लोग कहते हैं कि अकेलेपन में नेगेटिव एनर्जी सबसे ज्यादा महसूस होती है, तो मम्मी को भी धीरे-धीरे उस घर में बहुत अजीब लगने लगा।
मम्मी की तबीयत भी खराब रहने लगी। फिर साल 2000 में मेरा जन्म हुआ और फिर 2003 में मेरी बहन का जन्म हुआ। मम्मी की तबीयत खराब ही रहती थी। लोग कहते थे कि दो बच्चे जल्दी हो जाने की वजह से शरीर में कमजोरी आ गई है। मम्मी की उम्र भी तब सिर्फ 23 साल थी और इतनी कम उम्र में वे दो बच्चों की मां बन चुकी थीं।
वह घर जहां हम रहते थे, वह 300 गज में बना था। इतने बड़े घर को मम्मी अकेले संभालती थीं। हमारा घर पुरानी दिल्ली में था, जहां घर एक-दूसरे से बिल्कुल सटे हुए होते हैं।
हमारा घर ऐसा था कि घर में घुसते ही आगे एक बड़ा सा आंगन था और आंगन के सामने दोनों तरफ एक-एक कमरा बना हुआ था। सामने दोनों कमरों के बीच टॉयलेट, बाथरूम और किचन बना था। हम लोग बाईं तरफ वाले कमरे में रहते थे।
एक दिन मम्मी अपने कमरे में नमाज़ पढ़ रही थीं, तब उन्हें ऐसा लगा जैसे सामने खिड़की पर किसी ने हाथ रखा हो। वह खिड़की घर के आंगन में खुलती थी। मम्मी को बहुत हैरानी हुई कि खिड़की पर हाथ किसने रखा। उन्होंने जल्दी से नमाज़ पूरी करके कमरे से बाहर आकर देखा, लेकिन बाहर कोई नहीं था।
बाहर का एंट्रेंस गेट और छत वाला गेट दोनों बंद थे। मतलब उन दरवाज़ों से वहां कोई आ नहीं सकता था। मम्मी बहुत घबरा गईं और जल्दी से पापा को बुलाया। लेकिन पापा ने यह कहकर बात टाल दी कि “तुम्हें ज़रूर कोई वहम हुआ होगा।”
कई महीनों तक ऐसा ही चलता रहा। मम्मी की तबीयत खराब ही रहती थी। फिर 2004 में मेरे चाचा की भी शादी हो गई। चाची का जो कमरा था, वह हमारे कमरे के ऊपर बना था। हमारे सामने वाले कमरे में दादा-दादी रहने लगे थे और उनके ऊपर की छत खाली थी। आंगन वाला इलाका भी पूरा खुला था जहां से आसमान दिखाई देता था।
लेकिन चाची कहती थीं कि उनका उस तरफ मन नहीं लगता, इसलिए उनकी शादी के छह महीने बाद दादा ने दूसरी तरफ वाली छत पर उनका कमरा बनवा दिया। उनका पुराना कमरा हमने स्टोर रूम बना दिया।
इसी दौरान पापा के काम में बहुत बड़ा नुकसान हो गया और उन्हें अपना काम बंद करना पड़ा। इसके बाद पापा ने कई तरह के काम शुरू करने की कोशिश की लेकिन कोई भी काम नहीं चल रहा था।
एक दिन पापा मस्जिद में नमाज़ पढ़ने गए थे। वहीं एक बहुत बुजुर्ग अंकल पापा के पास आए और बोले, “तुम जिस कमरे में रहते हो, वहां तुम्हारे साथ कोई अनदेखी ताकत भी रहती है जो तुम्हें कभी तरक्की नहीं करने देगी।”
लेकिन इससे पहले कि पापा उनसे और कुछ बात कर पाते, वह अंकल वहां से उठकर चले गए और नमाज़ियों की भीड़ में गायब हो गए। पापा ने उन्हें अगले कई दिनों तक मस्जिद में ढूंढा लेकिन वह कहीं नहीं मिले।
जब पापा ने यह बात घर में बताई तो दादा बोले कि “हम एक काम करते हैं। हमारे घर के बगल में ही 45 गज का एक दूसरा घर था जो हमारे घर से सटा हुआ था और उस समय वह घर बिक रहा था।”
तो दादा ने वह घर खरीद लिया और दोनों घरों के बीच जो दीवार थी, उसे तुड़वा दिया। साथ ही उस घर में पेड़ था जिसकी शाखाएँ हमारी खिड़की तक आती थीं.. लेकिन हमारे पड़ोसियों ने वह पेड़ कटवा दिया.. उस पेड़ के कटने के बाद तो हमारे हालात और ज्यादा खराब हो गए.. माँ को डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, कोलेस्ट्रॉल जैसी तरह-तरह की बीमारियाँ हो गईं… पापा को भी ब्लड प्रेशर और गैस्ट्रिक समस्याएँ रहने लगी थीं। हालत तो यहाँ तक आ गई थी कि कोई काम न होने की वजह से पापा को 2 साल घर में ही बैठना पड़ा। पापा की सेविंग्स से ही हमारे घर का खर्चा चल रहा था.. लेकिन 2 साल तक सेविंग्स कहाँ चलने वाली थीं.. अब पापा की सेविंग्स भी खत्म हो गईं.. और अब शुरू हुआ हमारे साथ वो सब कुछ होना।

हमारे बाथरूम में ऊपर की तरफ एक छोटी सी खिड़की थी वेंटिलेशन के लिए, जो पीछे गली की तरफ खुलती थी।.. एक दिन मुझे उस बाथरूम में एक परछाईं दिखाई दी, जैसे कि अंदर कोई खड़ा हो। मैंने घर में सबको बताया तो सब बोले कि बाहर स्ट्रीट लाइट से कोई परछाईं दिखी होगी। लेकिन उस वक्त बाथरूम में अंधेरा था, तो बाहर से परछाईं कैसे दिख सकती थी। फिर कुछ दिन बाद एक रात हम अपने कमरे में सो रहे थे। उस वक्त हमारे रूम का गेट खुला हुआ था जिससे बाहर की सीढ़ियाँ साफ नजर आ रही थीं। अब सोते-सोते अचानक से मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि मेरे पापा बाहर सीढ़ियों पर खड़े हुए हैं। मैंने नींद में ही लेटे-लेटे माँ से कहा कि पापा को अंदर बुला लो। पापा बाहर सीढ़ियों पर क्यों खड़े हैं? तो माँ बोली कि पापा उनके बगल में ही सो रहे हैं।

माँ की बात सुनके मैं घबरा गई और जल्दी से लैंप ऑन किया। मैं इतना डर गई थी कि बाहर जाकर देखने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। पापा को उठाया तो पापा बाहर देखने भी गए.. लेकिन बाहर कोई नहीं था। ऐसे ही एक दिन रात के समय मेरी माँ सो रही थीं तो उनको ऐसा लगा कि पापा उनके पास आकर लेटे हैं और उनके साथ अंतरंग हो रहे हैं। माँ को सब कुछ अच्छे से महसूस हो रहा था। फिर कुछ देर बाद पापा रूम से बाहर चले गए। इसके बाद रात करीब 2 बजे पापा बाहर से आए और आकर मम्मी के साथ लेट गए। माँ ने कहा कि अभी एक घंटा पहले ही तो आप मेरे पास से गए थे। पापा बोले क्या… पागल हो क्या.. मैं तो डिनर करके सीधे बाहर चला गया था। और बस अभी घर आया हूँ। ये सुनते ही माँ के तो पैरों तले जमीन खिसक गई। माँ ने तभी हंगामा कर दिया और उस कमरे में रहने से साफ मना कर दिया।

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तो इसके बाद हम उस कमरे को छोड़कर, जिस कमरे में पहले चाची रहती थीं, जिसको बाद में स्टोर रूम बना दिया था, वहाँ शिफ्ट हो गए। ये कमरा भी हमारे पहले वाले कमरे के ऊपर था और घर के दाहिने तरफ ही पड़ता था। वहाँ से जाने के बाद हमने वहाँ एक लाइट छोड़ दी, जिससे कि रात में वहाँ अंधेरा न रहे। लेकिन अगले ही दिन वो लाइट खराब हो गई। हमने वो लाइट बदली तो अगले दिन वो लाइट फूटी पड़ी मिली। इसके बाद हमने वहाँ 7-8 लाइट्स बदलीं, लेकिन हर बार ऐसा ही होता था कि लाइट्स अपने आप खराब हो जातीं। लेकिन फिर 2 महीने बाद वो जगह किसी ने अपने गोदाम बनाने के लिए खरीद ली और दोनों घरों के बीच दोबारा दीवार खड़ी कर दी गई।

अब हम नीचे जिस कमरे में गए थे वहाँ बेड पर लेटे-लेटे नीचे का किचन साफ नजर आता था। एक रात सोते-सोते मेरी आँख खुली तो मेरी नजर नीचे किचन पर गई। मैंने देखा कि वहाँ से कोई परछाईं झांक कर मुझे देख रही थी। लेकिन तब तक हमारे साथ इतना कुछ हो चुका था कि इस बार मैं डरी नहीं। बस चुपचाप दूसरी तरफ मुँह करके सो गई। घर में कितनी बार हम लोगों को सोते हुए कोई अपने पास बैठा दिखाई देता। हम सबको ही घर में परछाईं दिखाई देती थीं। लेकिन हमारी मजबूरी थी कि हम चाहकर भी उसे छोड़ नहीं सकते थे। और वो जो भी चीज़ थी वो हमें दिखती तो थी.. लेकिन हमें कभी कोई नुकसान नहीं पहुँचाती थी।

जाने के लिए कहीं और कोई जगह भी नहीं थी। इसलिए हम वहीं रहते रहे। लेकिन एक चीज़ हमें समझ आ गई थी कि उस घर में जो भी चीज़ थी वो घर के दाहिनी साइड वाले हिस्से में ही रहती थी। क्योंकि बाईं साइड वाले हिस्से में नीचे दादा-दादी और उनके ऊपर चाचा-चाची आराम से रहते थे। घर का किचन भी दाहिनी साइड पर ही था, इसलिए वो परछाईं वहाँ भी दिखती थी। फिर एक दिन शाम 5 बजे के करीब मेरी दादी हमारे वाले रूम में सो रही थीं तो दादी ने साफ-साफ देखा कि एक परछाईं हमारे कमरे की दीवार से अंदर आई और सामने दूसरी दीवार के अंदर जाकर गायब हो गई। इसके बाद दादी ने फैसला किया कि वो घर में किसी मौलाना को बुलाकर चेक करवाएँगी। लेकिन जिस दिन मौलाना साहब आने वाले थे, उससे एक दिन पहले ही दादी की शुगर 1200 तक पहुँच गई। और अगले ही दिन उनकी मौत हो गई। ये सब इत्तेफ़ाक था या क्या, ये तो हमें नहीं पता, लेकिन दादी की अचानक मौत से सारे घरवाले इतने सदमे में थे कि मौलाना को बुलाने की बात सब भूल गए।

इसके बाद अगले दो महीनों तक सब कुछ ठीक रहा। फिर मेरी तबीयत खराब होने लगी। मुझे तेज़ बुखार और स्लीप पैरालिसिस होने लगा। एक बार तो मुझे लगातार 5-6 रातों तक स्लीप पैरालिसिस हुआ। ऐसा लगता जैसे कोई मेरा ज़ोर से मुँह दबा रहा हो। मैं हिल भी नहीं पाती थी, ना मुँह से कोई आवाज़ निकलती। मैं इतनी डर गई थी कि माँ-पापा के बीच में सोने लगी थी। जैसे ही थोड़ी देर के लिए आँख लगती, फिर से स्लीप पैरालिसिस हो जाता।

फिर एक दिन मुझे सपने में अपनी मरी हुई दादी दिखाई दीं। वो मुझसे बोलीं, “तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें लेने आई हूँ।” ये सपना देखकर मैंने नींद में ही ज़ोर से चीख मारी। अब मुझे लगने लगा था कि मैं पक्का मरने वाली हूँ। इसीलिए मैं सारी-सारी नमाज़ पढ़ती रहती थी, ताकि अगर मैं मर भी जाऊँ, तो ईमान की हालत में मरूँ।

मेरे चेहरे पर ऐसे निशान बन गए थे, जैसे किसी ने मेरे चेहरे को नोच दिया हो। मैंने तब अपने चेहरे की फोटो भी ली थी, लेकिन पापा ने वो पिक डिलीट करवा दी। डॉक्टर को बुलाया तो उन्होंने बताया कि ये अपनी दादी की मौत की वजह से डिप्रेशन में है। फिर मुझे एक झाड़-फूंक करने वाले को दिखाया। उन्होंने मुझे चेक करने के बाद बताया कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ।

उन्होंने कहा, “तुम्हारे घर में कोई साया तो है, लेकिन वो तुम्हें कोई नुकसान नहीं करेगा।” तीन महीने तक उन्होंने मुझे अपने पास इलाज के लिए बुलाया, जिसके बाद मैं बिल्कुल ठीक हो गई। लेकिन इसके बाद मेरे बाल बहुत झड़ने लगे। सिर के पीछे की तरफ तो गंजेपन का निशान भी बन गया था, जिसे मैं आज तक काजल से ढककर रखती हूँ। पहले मेरे बाल कमर तक आते थे, लेकिन अब मेरे बाल रूखे-सूखे होकर गर्दन तक रह गए थे।

इस बारे में मैंने उन्हें बताया तो वो बोले, “जो भी चीज़ तुम्हें सता रही थी, उसने तंग करना बस इसलिए छोड़ा है, क्योंकि अब वो तुम्हारे बालों की खूबसूरती अपने साथ ले गई है। अब तुम्हारे बाल हमेशा ऐसे ही रहेंगे।” लेकिन मैं खुश थी कि कम से कम मेरी जान तो बच गई।

इस घटना के छह महीने बाद ही मेरी सगाई भी हो गई। सगाई के कुछ दिनों बाद, एक शाम मैं टहलते हुए फोन पर अपने मंगेतर से बात कर रही थी। फिर कुछ देर बाद, जैसे ही मैं थककर बिस्तर पर बैठी, तो अचानक से मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे दो सेकंड के लिए पूरा बिस्तर ज़ोर से हिला हो। मैं एकदम से घबरा के उठ गई।

माँ तब सामने ज़मीन पर बैठी थीं। उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?” तो मैंने उन्हें इस बारे में बताया। उन्होंने मुझे अपने पास बैठा लिया। कुछ ही देर बाद, पापा भी आकर उस बिस्तर पर लेट गए। लेकिन सुबह तक पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई। पापा की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि सुबह, जब वो चाय पी रहे थे, तो गरम चाय उनके हाथ से उनके ऊपर गिर गई।

लेकिन उनकी इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि उठकर अपने कपड़े साफ कर सकें। माँ ने ही पापा के कपड़े बदले। फिर रात तक जब पापा की तबीयत नहीं सुधरी, तो हमने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवा दिया। डॉक्टर ने बताया कि उनकी किडनी सिर्फ 30% काम कर रही है। हमने चार अलग-अलग अस्पतालों में पापा को दिखाया, लेकिन हर जगह डॉक्टर एक ही बात कह रहे थे।

उस वक्त हम सब बेहद डर गए थे। उसी दौरान मेरा बी.एस.सी का प्रैक्टिकल एग्जाम चल रहा था, लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं पेपर दे सकूँ। इसलिए मैंने प्रैक्टिकल छोड़ दिया। मैं एक अच्छी स्टूडेंट थी, इसलिए टीचर्स को भी हैरानी हुई कि मैंने पेपर कैसे छोड़ दिया।

शाम तक मेरे पास आठ टीचर्स के कॉल आए। तब तक सबको पापा के बारे में पता चल चुका था। पापा अभी भी अस्पताल में ही थे। चाचा, माँ और मेरे मंगेतर पापा के साथ अस्पताल में रहते, और मैं और मेरी बहन घर पर दादा और चाची के साथ रहते थे।

हम उनके ठीक होने की दुआ करते रहते। यहाँ तक कि हमने अपने सबसे पवित्र स्थान मक़्का-मदीना में भी उनके लिए दुआ कराई। अल्लाह के करम से चार दिन के अंदर पापा की रिपोर्ट्स बिल्कुल ठीक हो गईं। पहले, उनकी जो किडनी 30% ही काम कर रही थी, अब अचानक से 83% काम करने लगी थी।

डॉक्टर्स भी हैरान थे कि ऐसा कैसे हुआ। उन्होंने खुद कहा था कि यह तो चमत्कार है। ऊपरवाले ने ही इन्हें नई ज़िंदगी दी है। 15 दिनों बाद पापा घर वापस आ गए। लेकिन अगले सात महीनों तक उनका इलाज चलता रहा।

इस घटना के बाद दादा ने फैसला किया कि अब उस कमरे में कोई नहीं रहेगा। और अब हम बाईं तरफ वाले दादा-दादी के कमरे में शिफ्ट हो गए। दादी की मौत हो चुकी थी, इसलिए दादा एक महीना हमारे कमरे में सोते और फिर एक महीना चाचा के साथ।

उस कमरे से जाने के बाद फिर हमारे साथ कोई परेशानी नहीं हुई। हमारा वो कमरा, जहाँ माँ शादी के बाद आई थीं, उसके ऊपर वाला चाची का कमरा, जहाँ बाद में हम शिफ्ट हुए थे, उसके ऊपर छत और किचन तक सब जगह फेंसिंग कर दी गई। वहाँ सबका आना-जाना बंद कर दिया गया और एंट्रेंस गेट के पास ही एक किचन बना दिया गया। इसके बाद हमारे साथ सब कुछ ठीक हो गया।
एक सवाल आपके मन में आ सकता है कि इतना सब कुछ हो गया, मगर हमने वह घर क्यों नहीं छोड़ा? इसका कारण यह है कि पापा को काम में बहुत नुकसान हो चुका था, इसलिए वह अब बस ₹18,000 की नौकरी करते थे। चाचा को भी अपनी दुकान से कोई स्थिर कमाई नहीं होती थी। कभी ₹50,000 आ जाते, तो कभी ₹10,000 भी नहीं आते थे। दादा की उम्र भी बहुत हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने काम पर जाना छोड़ दिया था। चाचा की भी दो बेटियाँ थीं। नौ लोगों की फैमिली के हिसाब से इतना बड़ा घर किराए पर लेना बहुत महंगा पड़ रहा था।

दोनों भाई मिलकर भी ज़्यादा से ज़्यादा ₹50,000 ही कमा पाते थे। हमने यह भी कोशिश की कि इस घर को किराए पर देकर, उसी के पैसे से कहीं और किराए पर घर लें। लेकिन जो भी किरायेदार वहाँ आता, उसके साथ उस घर में कुछ ऐसा हो जाता कि वह बीच में ही घर छोड़कर भाग जाता। पूरे इलाके में हमारे घर की बात फैल चुकी थी, इसलिए अब कोई किराए पर भी वह घर लेने को तैयार नहीं होता था। इसीलिए हमें मजबूरी में वहीं रहना पड़ा।

फिर पापा के ठीक होने के कुछ महीनों बाद, 2019 में मेरी शादी हो गई। और शादी के पाँच महीने बाद मैं प्रेग्नेंट हो गई। मेरे पति की सिर्फ एक बहन है, जो कि शादीशुदा है। पति के माता-पिता का भी देहांत हो चुका था, इसलिए घर पर बस मैं और मेरे पति ही रहते थे। मगर जब मेरी प्रेग्नेंसी का पता चला, तो माँ ने मुझे अकेले रहने से मना कर दिया और अपने पास बुला लिया।

क्योंकि मेरे पति नौकरी पर जाते थे, तो सारा दिन मैं भी माँ की तरह घर पर बिल्कुल अकेली होती। इसीलिए प्रेग्नेंसी में उन्होंने मुझे अकेला नहीं छोड़ा और अपने पास बुला लिया। हालाँकि मायके में भी हमारे साथ बहुत कुछ हो चुका था, इसीलिए वहाँ भी थोड़ा डर लगता था, लेकिन ससुराल में अकेले रहने से बेहतर था।

लेकिन फिर मेरी प्रेग्नेंसी में भी कुछ कॉम्प्लिकेशन्स हो गईं। मैं हर समय बेड रेस्ट पर ही रहती थी। बस खाने के लिए ही उठती थी। बेबी की मूवमेंट भी महसूस नहीं होती थी, इसीलिए हमेशा टेंशन लगी रहती थी।

फिर मार्च 2023 में कोरोनावायरस की वजह से लॉकडाउन लग गया। तब मेरा सातवाँ महीना चल रहा था। और फिर 1 अप्रैल को, सातवें महीने में ही, मुझे अचानक से लेबर पेन शुरू हो गया। तो हम जल्दी से पास के क्लीनिक में गए। वहाँ डॉक्टर ने कहा कि डिलीवरी करनी पड़ेगी, लेकिन बेबी को एनआईसीयू में रखना होगा। और उनके क्लीनिक में एनआईसीयू नहीं था, इसलिए हमें फिर प्राइवेट हॉस्पिटल जाना पड़ा।

कोरोनावायरस की वजह से तब लॉकडाउन लगे हुए सिर्फ एक हफ्ता हुआ था। इसीलिए प्राइवेट हॉस्पिटल में सबसे पहले उन्होंने मेरा फीवर चेक किया, तो मुझे 102 डिग्री बुखार था। डॉक्टर ने मेरी डिलीवरी करने से मना कर दिया और गवर्नमेंट हॉस्पिटल जाने को कहा।

लेकिन गवर्नमेंट हॉस्पिटल में तब सिर्फ कोविड के पेशेंट्स ही एडमिट किए जा रहे थे। उन्होंने भी मुझे एडमिट करने से मना कर दिया। फिर हम दिल्ली के एक बहुत ही महंगे हॉस्पिटल ब्लके मैक्स में गए। वहाँ डॉक्टर ने पहले ही बोल दिया कि डिलीवरी तो सी-सेक्शन से ही करनी पड़ेगी, लेकिन बच्चे के बचने की गारंटी नहीं है।

हम उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन अल्लाह के करम से, 2 अप्रैल 2020 को, ठीक 2 बजकर 2 मिनट पर मेरा बेटा पैदा हुआ। मगर प्रीमैच्योर होने के बावजूद वह बिल्कुल स्वस्थ था। सातवें महीने में भी उसका वज़न 2 किलो था। डॉक्टर ने कहा कि यह तो ऊपरवाले का ही कोई अच्छा इशारा है, क्योंकि उसकी पूरी डेट ऑफ बर्थ में बस 2 ही आता था।

डिलीवरी के बाद मेरे पति मुझे सीधा मेरे ससुराल ले गए, क्योंकि उनको डर था कि मेरे मायके में रहने की वजह से ही यह सब हुआ है। उन्होंने मेरे माँ-पापा और मेरी बहन को भी लॉकडाउन खुलने तक अपने पास बुला लिया। मेरा बेटा एक महीने तक एनआईसीयू में रहा। और फिर डॉक्टरों ने उसे मुझे दे दिया। आज हमारी शादी को 6 साल होने वाले हैं। लेकिन मेरे पति आज भी मेरे मायके को ही वजह मानते हैं मेरी ऐसी अचानक डिलीवरी होने की। मगर मेरा बेटा बिल्कुल ठीक है और स्वस्थ है।.

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