नमस्ते दोस्तों,
हिंदी हॉरर स्टोरीज़ यूट्यूब चैनल में आपका स्वागत है। और आज है शनिवार की रात, मतलब ख़ौफ़ की रात। क्योंकि आज से मैं आपके लिए शुरू कर रहा हूँ मेरा नया शो – “सैटरडे नाइट हॉरर स्टोरीज़ विद प्रवीण”।
इस शो में मैं आपके लिए देश-विदेश से दुनिया भर की सबसे ख़ौफ़नाक और डरावनी कहानियाँ लेकर आऊँगा। और आज के इस पहले एपिसोड में मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ डायनों की 3 ऐसी कहानियाँ, जिन्हें सुनकर आपको मज़ा आएगा।
डायन – ये नाम आपने कई बार सुना होगा। लेकिन डायन होती क्या है, ये शायद आपको नहीं पता। बहुत से लोग सोचते हैं कि डायन किसी औरत की आत्मा या भूत को कहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। डायन एक जीती-जागती औरत होती है, जो जादू-टोना करती है और हमारे ही बीच रहती है। ये डायनें तरह-तरह के काले जादू करती हैं, बलि लेती हैं, जिससे उनकी ताक़त बढ़ सके।
तो आज के इस एपिसोड में मैं आपके लिए ऐसी ही डायनों की तीन असली डरावनी कहानियाँ लेकर आ रहा हूँ। तो खुद भी सुनिए और अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिए। और हेडफ़ोन लगाकर इसका मजा लीजिए – प्रवीण के साथ।
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मैं आपको अपना असली नाम नहीं बता सकता, क्योंकि आज जो बातें मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो इतनी निजी और डरावनी हैं कि मैंने आज तक किसी से साझा नहीं कीं। इस समय मेरी उम्र 34 साल है। मैं दिल्ली में रहता हूँ और एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता हूँ। लेकिन जब मैं 8-9 साल का था, तब मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। ये सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में मैंने कभी अपने घरवालों को भी कुछ नहीं बताया। लेकिन आपके इस चैनल पर इतनी सारी सच्ची कहानियाँ सुनने के बाद, मैंने ये फैसला किया कि मुझे भी ये बातें दुनिया के सामने रखनी चाहिए। ताकि लोगों को पता चले कि ऐसा भी इस दुनिया में होता है। हो सकता है कुछ लोगों को ये बातें झूठी लगें, लेकिन यकीन मानिए, जो कुछ मैं बताने जा रहा हूँ, वो एकदम सच है। उन दिनों हम लोग इलाहाबाद में रहते थे, जो अब प्रयागराज बन चुका है। मेरे पापा की सरकारी नौकरी थी, इसीलिए हम एक सरकारी कॉलोनी में रहते थे। उस कॉलोनी में रहने वाले सब लोग एक ही विभाग में काम करते थे, इसलिए सब एक-दूसरे को जानते थे। कॉलोनी ज्यादा बड़ी नहीं थी, मुश्किल से 150-200 घर होंगे। उन्हीं घरों में एक पति-पत्नी रहते थे। वो अंकल पापा के विभाग में ही काम करते थे। पता नहीं वे किस राज्य के थे, शायद पंजाबी थे या बंगाली, मुझे ठीक से नहीं पता क्योंकि उस समय मेरी समझ उतनी नहीं थी। लेकिन इतना मालूम था कि वे इस जगह के लोकल नहीं थे। उन अंकल की जो पत्नी थीं, उनका नाम संध्या था। हम सब उन्हें संध्या आंटी कहकर बुलाते थे। संयोग की बात थी कि संध्या आंटी का घर हमारे घर के ठीक बगल में था। दिन में जब मम्मी और आसपास की लेडीज़ मिलकर बातें करती थीं, तो मैं अक्सर उन्हें संध्या आंटी के बारे में बात करते हुए सुनता था। पता नहीं क्यों, कॉलोनी की ज्यादातर औरतें संध्या आंटी को पसंद नहीं करती थीं। मैंने कई बार उन औरतों को ये बात करते सुना था कि संध्या टोने-टोटके करती है। मुझे इसका मतलब समझ नहीं आता था। लेकिन एक बात साफ थी, कि संध्या आंटी दिखने में बहुत सुंदर थीं। मतलब, मैं छोटा था लेकिन बड़े लड़कों के साथ खेला करता था। और बड़े लड़के भी अक्सर उनकी खूबसूरती की बात करते थे। मुझे भी इतना समझ आता था कि वो बहुत सुंदर थीं। लेकिन संध्या आंटी को एक बीमारी थी – दौरे पड़ने की बीमारी। मतलब मिर्गी वाले दौरे नहीं, बल्कि एक अजीब तरह के दौरे। वो बिल्कुल ठीक रहती थीं, लेकिन अचानक से बहुत अजीब-अजीब हरकतें करने लगती थीं। जैसे कई बार, जब हम ग्राउंड में क्रिकेट खेल रहे होते थे, तो वो अचानक बीच में आ जातीं और हमारे से बैट छीनने लगतीं। कहतीं, “मैं भी खेलूंगी।” बड़े लड़के उनके साथ उल्टी-सीधी हरकतें करते, और उनकी आवाज भी बदल जाती थी। मैं आपको एक किस्सा बताता हूँ। एक बार हम खेल रहे थे, तो वो अचानक नाइट ड्रेस पहनकर ग्राउंड में आ गईं और कहने लगीं, “मैं भी खेलूंगी। मुझे भी खिलाओ।” उनकी आवाज किसी आदमी जैसी नहीं लग रही थी, बल्कि बिल्कुल किसी छोटे बच्चे जैसी। कई बार वो लोगों पर पत्थर फेंकने लगतीं। बड़े लड़के उन्हें शांत करने के बहाने उनके साथ छेड़खानी करते। फिर उनके पति आकर उन्हें घर ले जाते। एक-डेढ़ साल तक ऐसा ही चलता रहा। कई बार कॉलोनी की औरतें संध्या आंटी के घर के बाहर आकर शोर मचातीं, उन्हें गालियां देतीं। बोलतीं, “तू ऐसा क्यों कर रही है हमारे साथ?”.हमने तेरा क्या बिगाड़ा है? असल में होता यूँ था कि लोगों के घरों के बाहर कई बार उड़द की दाल पड़ी होती थी, टोने-टोटके के साथ। बहुत से लोगों के घर के बाहर ऐसा हुआ था। लोग बताते थे कि ये सब संध्या ही करती है। इसीलिए जब भी किसी के घर के बाहर ऐसा होता, तो वे लोग उससे लड़ने आ जाते। लेकिन वो दरवाजा नहीं खोलती थी। उसके पति से भी लोग शिकायत करते। मुझे समझ नहीं आता था कि वे लोग संध्या आंटी से क्यों लड़ते हैं। मुझे तो वो इतनी अच्छी लगती थी। इस बीच मैं भी बड़ा हो रहा था। अब मैं 10-11 साल का हो चुका था। कई बार सर्दियों के दिनों में मेरी मम्मी और आंटियां वगैरह धूप सेकने के लिए घर के पीछे की तरफ बैठ जाती थीं। तो सामने वाले घर से संध्या आंटी मुझे देखकर मुस्कुरातीं और मुझे अपने पास बुलाने का इशारा करतीं। लेकिन मैं उनके घर नहीं जाता था। इसके बाद अक्सर ऐसा होने लगा कि जब भी मैं स्कूल से लौटता, तो संध्या आंटी मुझे बहुत अजीब तरीके से देखतीं। गुस्से से नहीं, न ही प्यार से, बस ध्यान से, जैसे मुझे देखकर उनके दिमाग में कोई कैलकुलेशन चल रही हो। धीरे-धीरे मुझे संध्या आंटी के सपने आने लगे। लेकिन सपनों से पहले एक और बात बतानी है। मुझे नहीं पता था कि ये मेरा वहम था या कुछ और, लेकिन मेरे साथ ऐसा होता था कि रात में मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आती थी। पापा तो 8-9 बजे ही ड्रिंक करके सो जाते थे। लेकिन मैं 10-11 बजे तक जगा रहता था। रात में जब मैं कमरे में बिना लाइट के लेटा होता, तो कई बार मुझे बहुत डर लगने लगता। डरते-डरते मैं आँखें बंद करके ध्यान से सुनता। ऐसा लगता, जैसे कोई हमारे दरवाजे को बहुत धीरे-धीरे खटखटा रहा हो। मैं ध्यान से सुनता, तो दरवाजा कुछ देर खटकता और फिर मुझे ऐसा लगता, जैसे दरवाजे की कुंडी अपने आप खुल रही है। और उसके बाद किसी के कदमों की आवाज अंदर आने लगती। हर आवाज, हर स्टेप साफ-साफ सुनाई देता, लेकिन सिर्फ मुझे। घर में और किसी को नहीं। जैसा मैंने बताया, मुझे नहीं पता कि ये सच था या मेरा वहम। हो सकता है, ये मेरे बचपन की कल्पना हो। क्योंकि दरवाजा अपने आप कैसे खुल सकता है? कुंडी अंदर से अपने-आप कैसे खुल जाएगी? ऊपर से सुबह जब सब उठते, तो दरवाजा बंद मिलता। धीरे-धीरे ये आवाजें मुझे रोज सुनाई देने लगीं। पहले तो सिर्फ आवाजें ही आती थीं, लेकिन फिर मुझे सपने आने लगे। संध्या आंटी के सपने। सपने में मुझे संध्या आंटी दिखाई देतीं। उनके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं होता था। ठीक से कुछ भी साफ नजर नहीं आता था, लेकिन ये समझ आता था कि ये संध्या आंटी हैं और उन्होंने कपड़े नहीं पहन रखे हैं। और ये बात ऐसी थी, जो मैं किसी को बता भी नहीं सकता था। कुछ दिन बाद अचानक एक दिन पापा को बहुत तेज बुखार हो गया। पापा ने ऑफिस से भी छुट्टी ले ली। कुछ दिन बाद जब पापा ठीक हुए, तो मैंने पापा-मम्मी को बातें करते सुना। पापा मम्मी को बता रहे थे कि रात में उन्होंने हमारे कमरे की खिड़की के बाहर दीवार पर एक औरत को रेंगते हुए देखा। पापा ये देखकर इतने डर गए कि उन्हें कई दिनों तक बुखार चढ़ गया। मैं पापा-मम्मी से पूछता, लेकिन वे मुझे कुछ नहीं बताते। उधर, संध्या आंटी मुझे रोज सपनों में दिखाई देती थीं। एक दिन ऐसा हुआ कि रात में सोने से पहले पापा ने मुझसे कहा कि ऑलआउट लगा दो। उन दिनों लंबी तार वाली ऑलआउट आती थी, जिसे स्विच में लगाकर चालू करना होता था। तो मैंने ऑलआउट लगाकर स्विच ऑन कर दिया। लेकिन संयोग से मैंने ऑलआउट की जगह वहां टेबल पर रखी पानी गर्म करने वाली रॉड को स्विच में लगाकर चालू कर दिया। इसके बाद सब लोग सोने चले गए। रात में अचानक मेरी नींद खुल गई। मुझे कमरे के अंदर से अजीब-सी चिरचिराहट की आवाज सुनाई दी। वैसे तो मुझे ऐसी आवाजें हर रात सुनाई देती थीं, लेकिन उस रात ये आवाजें कमरे के अंदर से आ रही थीं। मैं बुरी तरह डर गया और चुपचाप रजाई में मुँह ढककर लेटा रहा। तभी कुछ देर बाद, अचानक पापा ने मुझे और मम्मी को जल्दी से उठाया और कमरे से बाहर ले गए। असल में, मैंने जो रॉड लगाई थी, वह इतनी देर तक प्लग में लगी रही कि उसकी तार पिघल गई और कमरे में आग लग गई। लेकिन पापा की जल्दीबाजी में ध्यान नहीं गया और वे नंगे पैर आग बुझाने के लिए एक बाल्टी पानी लाए और उसे आग पर डाल दिया। पानी डालने से हुआ यूँ कि आग तो बुझ गई, लेकिन पूरे कमरे में करंट फैल गया। पापा नंगे पैर थे, इसलिए उन्हें करंट लग गया। पापा को ऐसा देखकर मम्मी ने शोर मचाया और आसपास के लोगों को बुलाया। कुछ लोग घर में आए, तो सबसे पहले उन्होंने एमसीबी बंद की। उसके बाद पापा को अस्पताल ले जाया गया। खुशी की बात ये है कि पापा सही-सलामत थे। बस उनका एक पैर जल गया था। तब तो मुझे समझ नहीं आया, लेकिन आज सोचता हूँ कि वो संध्या आंटी पापा के पीछे क्यों पड़ी थीं। क्योंकि पापा ही हमेशा मुझे उनके पास जाने से मना करते थे। असल में, वो संध्या आंटी एक डायन थीं और जादू-टोने का काम करती थीं। लेकिन मजबूरी ये थी कि कोई उनसे कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि वो औरत थीं और बात-बात पर पुलिस बुलाने की धमकी देती थीं। हम उस जगह को छोड़कर कहीं और जा भी नहीं सकते थे। इन सब बातों के अलावा और भी बहुत सारी चीजें थीं, जो उस वक्त मेरे और मेरे परिवार के साथ हुईं। लेकिन फिर खुशनसीबी से पापा का इलाहाबाद से ट्रांसफर हो गया और हम उस कॉलोनी को छोड़कर दूसरी जगह चले गए। वहाँ से जाने के बाद, मुझे वो सपने आना भी बंद हो गए और रात को वो आवाजें भी सुनाई देना बंद हो गईं। एक और बात बताना भूल गया। जब हम वहाँ रहते थे, तो हमारी कॉलोनी में एक मर्डर भी हुआ था। एक आदमी सीढ़ियों से गिरकर मर गया था। वो आदमी बहुत शराब पीता था, इसलिए पुलिस ने ये मामला बना दिया कि वो नशे की हालत में सीढ़ियों से गिरकर मर गया। लेकिन कॉलोनी के सभी लोग कहते थे कि उसे संध्या आंटी ने मारा है। क्योंकि उसकी मौत से कुछ दिन पहले उसका संध्या आंटी से बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था। उसने संध्या से पूछा था कि उसने उसके घर के बाहर टोटका क्यों किया। मुझे नहीं पता आज वो औरत जिंदा है या मर गई। लेकिन मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि हम उस कॉलोनी से चले गए। नहीं तो पता नहीं, हमारे साथ और क्या-क्या होता।
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मेरा नाम आंद्रे है। और मैं रोमानिया देश का रहने वाला हूँ। रोमानिया यूरोप में स्थित एक छोटा सा देश है। हमारा देश छोटा जरूर है, पर यहाँ बहुत सारे ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और बड़े-बड़े जंगल हैं। और यहाँ सर्दी बहुत ज्यादा पड़ती है। मैं यहाँ लिस्टियो नाम के एक छोटे से दूर-दराज गाँव में रहता हूँ, जो ठीक पहाड़ों के नीचे बसा हुआ है। मेरे घर में मेरी पत्नी और मेरी छोटी बेटी रहते हैं। बस, हम तीन लोग ही हैं। जैसा कि मैंने बताया कि यह एक छोटा सा गाँव है, इसलिए यहाँ की आबादी भी बहुत कम है। पूरे गाँव में मुश्किल से 300 लोग रहते होंगे। दूरस्थ गाँव होने की वजह से यहाँ विकास भी बहुत कम हुआ है। सड़कों पर लाइट्स ना के बराबर हैं, और ज्यादातर लोग अंधविश्वासी प्रकार के हैं। मेरी यह कहानी बहुत पुरानी नहीं है। इसकी शुरुआत करीब 6 साल पहले हुई थी। दरअसल, उन दिनों मैं और मेरी पत्नी काफी समय से दूसरा बच्चा करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन बच्चा नहीं हो रहा था। एक दिन मेरी पत्नी को गाँव की ही उसकी एक दोस्त ने एक बूढ़ी औरत के बारे में बताया। वो बूढ़ी औरत गाँव से बाहर पहाड़ों पर एक जगह रहती थी। लोग अपनी अलग-अलग परेशानियों को लेकर उसके पास जाते थे। चाहे किसी की शादी नहीं हो रही हो, या किसी को बच्चा नहीं हो रहा हो—वो औरत ऐसी समस्याओं का हल निकाल देती थी। उसकी दोस्त ने बताया कि वो औरत उन औरतों की मदद करती है जिनके बच्चे नहीं हो रहे होते। वो कुछ ऐसी दवाइयाँ देती थी, जिससे किसी भी औरत का बच्चा हो जाता। जब मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वो उस औरत से मिलने जाना चाहती है, तो पहले तो मैंने उसे मना कर दिया। मैंने कहा कि इन सब चीजों से कुछ नहीं होता, ये लोग बस दुनिया को बेवकूफ बनाते हैं। लेकिन सच बताऊँ तो दिल ही दिल में मैं भी चाहता था कि किसी तरह मेरा एक बेटा हो जाए। मैं उसे शहर के भी कई डॉक्टरों को दिखा चुका था, लेकिन गर्भधारण नहीं हो रहा था। इसलिए आखिर में मैंने उससे कहा कि चलो, उस औरत से भी मिल लेते हैं। एक दिन हम दोपहर करीब 2 बजे अपनी बेटी को पड़ोसियों के पास छोड़कर उस औरत से मिलने के लिए निकल पड़े। उसका घर गाँव से काफी दूर और बहुत सुनसान जगह पर था। जब हम वहाँ पहुँचे, तो मेरी पत्नी ने कहा कि उसे बहुत अजीब सा महसूस हो रहा है। मतलब, उस औरत के घर के पास जाते हुए उसे डर लगने लगा। मैंने कहा, “तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ।” उसके घर के बाहर पहुँचकर मैंने आवाज लगाई, “हैलो… कोई है क्या?” कुछ सेकंड बाद वो औरत बाहर आई। मन ही मन मैं सोच रहा था कि ये औरत कैसी होगी, कैसी दिखती होगी। लेकिन वो बिल्कुल सामान्य लग रही थी। मतलब, दिखने में सामान्य थी, बस बुजुर्ग थी। शायद उसकी उम्र 60-70 साल के आसपास होगी। वो बाहर आई तो मैंने कहा कि हम आपसे मिलने आए हैं। मेरी पत्नी को बच्चा नहीं हो रहा है, उसके लिए हमें आपकी मदद चाहिए। मेरी बात सुनकर वो 2 मिनट तक मेरी तरफ देखती रही। शायद वो बूढ़ी थी, इसलिए मुझे ऐसा लगा, या फिर क्यों, पता नहीं। लेकिन मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो गुस्से में हो। वो बोली, “तुम बाहर ही इंतजार करो। मैं तुम्हारी पत्नी को अकेले में देखना चाहती हूँ।” मैंने पूछा, “कितनी देर लगेगी?” उसने जवाब दिया, “आधा घंटा। तुम बाहर ही रुको।” मैंने कहा, “ठीक है।” इतना कहकर मैं उसके घर के सामने एक जगह जाकर बैठ गया, और वो मेरी पत्नी को लेकर घर के अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर दिया। बैठे-बैठे 40 मिनट गुजर गए, लेकिन मेरी पत्नी बाहर नहीं आई। अंदर से कोई आवाज भी नहीं आ रही थी। और ऊपर से, थोड़ी देर बाद दिन भी ढलने वाला था। मैं चाहता था कि हम अंधेरा होने से पहले घर पहुँच जाएँ। मैंने कुछ देर और इंतजार किया, लेकिन वो अब भी बाहर नहीं आई। पीछे जंगल से बीच-बीच में जानवरों की आवाजें आ रही थीं। बैठे-बैठे सवा घंटा बीत गया। अब मेरा धैर्य खत्म हो चुका था। मुझे यह डर भी लग रहा था कि कहीं उस औरत ने मेरी पत्नी के साथ कुछ गलत न कर दिया हो। मैं उठा और उसके दरवाजे पर जाकर खटखटाने लगा। “सेसिला… सब ठीक है न?” लेकिन कोई जवाब नहीं आया। 2 मिनट बाद मैंने फिर से दरवाजा खटखटाया। तो इस बार वही बूढ़ी औरत गुस्से में चिल्लाकर बोली, “क्या है! बार-बार दरवाजा मत खटखटाओ। अभी थोड़ा समय और लगेगा।” अब मुझे सच में अपनी पत्नी की चिंता होने लगी थी। हर मिनट मैं यही सोच रहा था कि अगर मेरी पत्नी बाहर नहीं आई, तो मैं इस औरत का दरवाजा तोड़कर अंदर चला जाऊँगा। और तभी मैं दरवाजे पर लात मारने की सोचकर खड़ा ही हुआ था कि अचानक से दरवाजा खुल गया और मेरी पत्नी बाहर आने लगी। उसका चेहरा बहुत अजीब सा लग रहा था। मैंने उससे पूछा, “तुम ठीक हो ना?” वो बोली, “हाँ, मैं ठीक हूँ।” लेकिन वो बुढ़िया बाहर नहीं आई, न उसने मुझसे कुछ कहा। बस मेरी पत्नी के बाहर निकलते ही अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद मैं अपनी पत्नी को लेकर सीधे घर आ गया। आते वक्त मैंने नोटिस किया कि वो कुछ बोल नहीं रही थी। मुझे लगा शायद उस औरत ने उसे कोई दवा वगैरह दी होगी, जिससे उसे नशा हो गया होगा। मैंने उससे पूछा भी कि अंदर क्या हुआ था। वो बोली कि उसे कुछ भी याद नहीं है। उसने कहा कि उसे बहुत थकान महसूस हो रही है और वो बस घर जाकर सो जाना चाहती है। मैंने भी उसे कुछ नहीं पूछा। सोचा कि सुबह अच्छे से बात करूँगा इस बारे में। मैं खुश था कि शायद अब हमें दूसरा बच्चा मिल जाए। लेकिन आते हुए मेरी पत्नी ने एक बात बताई कि उस औरत ने उसे पीने के लिए कोई चीज दी थी, जिसके बाद उसे बहुत अजीब सा नशा हो गया था। ज़रूर किसी तरह की कोई दवा होगी, जो जड़ी-बूटियों से बनी होगी। मैंने यह सोचकर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगले दिन मैंने उससे फिर पूछा कि कल वहाँ क्या-क्या हुआ था। लेकिन उसे तब भी कुछ याद नहीं था, सिवाय उस बात के कि उस औरत ने उसे पीने के लिए कुछ दिया था और कहा था कि इससे बच्चा ठहर जाएगा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। कुछ दिन और फिर कुछ हफ्ते इसी तरह बीत गए। लेकिन फिर, करीब ढाई महीने बाद, एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि वो प्रेग्नेंट हो गई है। आपको बता नहीं सकता कि यह ख़बर सुनकर मुझे कितनी खुशी हुई। लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद हमारे साथ अजीब-अजीब चीजें होने लगीं। एक रात, खाना खाने के बाद हम लाइट बंद करके सोने के लिए लेटे ही थे कि हमें बाहर से अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं। जैसे कोई बातें कर रहा हो, हँस रहा हो। वो आवाजें औरतों की लग रही थीं। बूढ़ी औरतों की। जैसे कई सारी बूढ़ी औरतें बाहर खड़ी होकर बातें कर रही हों। यह बहुत अजीब बात थी, क्योंकि गाँव में इतनी रात को कोई औरत इस तरह किसी के घर के बाहर खड़े होकर हँसकर बातें नहीं कर सकती। मैंने लाइट जलाकर खिड़की से बाहर झाँककर देखा, लेकिन बाहर कोई नहीं था। मुझे बहुत हैरानी हुई। क्योंकि इन आवाजों को मैंने ही नहीं, मेरी पत्नी ने भी सुना था। लेकिन फिर हमने उन आवाजों को अनसुना करके सोने की कोशिश की। लेकिन लेटे हुए मुश्किल से 20 मिनट ही हुए थे कि फिर से वही हँसने और बातें करने की आवाजें आने लगीं, बिल्कुल हमारे घर के बाहर से। मेरी पत्नी गहरी नींद में सो चुकी थी। इस बार मैंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा, तो उन आवाजों के साथ-साथ मुझे कई सारी परछाइयाँ इधर-उधर घूमती हुई दिखाई दीं। मतलब वे बिल्कुल काली परछाइयाँ थीं। पतली, लंबी परछाइयाँ। लेकिन यह समझ आ रहा था कि वे औरतों की परछाइयाँ हैं। उनके लंबे-लंबे बाल अलग ही नजर आ रहे थे। यह देखकर मैं आपको बता नहीं सकता कि मुझे कितना धक्का लगा। यकीन ही नहीं हो रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है, वो भी मेरे घर के बाहर। “नहीं नहीं, पक्का मुझे ही कोई धोखा हुआ होगा,” मैंने सोचा। मैं लेटे-लेटे हल्का सा पर्दा हटाकर देख रहा था। इसलिए ठीक से देखने के लिए मैं जैसे ही उठा और पूरा पर्दा हटाकर देखा, तो… तो बाहर कोई नहीं था। कोई परछाई नहीं थी। इस बीच मेरी पत्नी की भी आँख खुल गई। उसने मुझसे पूछा, “क्या हुआ? बाहर क्या देख रहे हो?” मैंने उसे उन परछाइयों के बारे में बताया। यह बात सुनते ही वो झट से उठी और दूसरे कमरे में सो रही हमारी बेटी के पास गई। उसे देखने के लिए कि वो ठीक तो है। मेरी बेटी बिल्कुल ठीक थी। अच्छे से सो रही थी। उस रात मुझे यह समझ आ गया था कि मेरे घर में कुछ न कुछ तो गड़बड़ हो रही है। लेकिन यह नहीं समझ आ रहा था कि यह सब क्यों हो रहा है। अगले 2-3 हफ्ते तक ऐसा ही चलता रहा। फिर एक दिन मेरी पत्नी ने कहा कि घर में बच्चा आने से पहले हमें चर्च के पादरी से घर को आशीर्वाद दिलवा लेना चाहिए। मैंने उसकी बात मान ली। और कुछ ही दिन बाद हमने अपनी लोकल चर्च के पादरी से निवेदन करके अपने घर को आशीर्वाद दिलवा लिया। लेकिन आशीर्वाद देने के बाद पादरी ने मुझसे कहा, “तुम्हारे घर में कोई बहुत ही नकारात्मक ऊर्जा है। जो कुछ यहाँ हो रहा है, वो सामान्य नहीं है।” पादरी की बात सुनकर मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या कहूँ। मैंने पूछा, “फादर, यह नकारात्मक ऊर्जा हमारे घर में कहाँ से आ गई?” मैंने उन्हें पिछले कुछ दिनों से जो अजीब चीजें घर में हो रही थीं, उनके बारे में भी बताया। मैंने कहा, “फादर, हमने तो जिंदगी में ऐसा कोई गलत काम भी नहीं किया, जिससे ऐसी कोई नकारात्मक चीज हमारे घर में आ जाए।” उन्होंने पूछा, “इन सब चीजों की शुरुआत कब से हुई?” मैंने कहा, “पक्का तो नहीं पता, लेकिन जब से सेसिला (मेरी पत्नी) प्रेग्नेंट हुई है, तभी से हो रहा है।” फादर बोले, “नहीं, किसी के प्रेग्नेंट होने से ऐसा नहीं हो सकता। उससे पहले कुछ हुआ था क्या?” तब मैंने उन्हें उस बुजुर्ग औरत के बारे में बताया, कि हम उसके पास गए थे दवा लेने के लिए। मेरी बात सुनते ही फादर ने सिर झुका लिया और बोले, “तुमने ये क्या किया?” मैंने पूछा, “क्या हुआ फादर? हमने कोई गलती कर दी क्या?” फादर बोले, “तुम्हें उसके पास नहीं जाना चाहिए था। ऐसी औरतें असल में डायन होती हैं और इलाज के नाम पर अपने काले जादू के लिए अनहोनी चीजें करती हैं।” उन्होंने बताया, “पहाड़ों पर रहने वाली इन डायनों का एक पूरा समूह होता है। ये दवाई या जड़ी-बूटी के नाम पर अपने काले जादू से मासूम लोगों को फँसा लेती हैं।” फादर की ये बातें सुनकर मेरे तो होश उड़ गए। मैंने उनसे पूछा, “फादर, अब मैं क्या करूँ? हमें इससे बचाइए।” फादर बोले, “तुम्हें कुछ समय के लिए इस जगह से बहुत दूर चले जाना होगा। इनकी काली शक्तियों की एक सीमा होती है। जब तक तुम उनकी सीमा के अंदर रहोगे, ये तुम्हें नियंत्रित कर सकती हैं।” उसके बाद, मैंने यह बात किसी तरह अपनी पत्नी को बिना बताए, उसे शहर ले जाने की योजना बनाई। गाँव छोड़ने के कुछ दिन बाद सब सामान्य हो गया। मेरी पत्नी ने लड़के को जन्म दिया और आज हमारा परिवार खुशी से जीवन व्यतीत कर रहा है।
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अपनी बात शुरू करने से पहले मैं आपको बता दूँ कि इस घटना से पहले मैं कभी भूत-प्रेत जैसी चीज़ों को नहीं मानता था। मैं यह नहीं कहूँगा कि मैं भगवान को नहीं मानता था, लेकिन मैं इन चीज़ों के बारे में सोचता नहीं था। लेकिन फिर एक दिन मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी सोच हमेशा के लिए बदल दी। यह करीब 10 साल पहले की बात है। मैं तब 16 साल का था। हम लोग एक छोटे से शहर में रहा करते थे। वो गाँव तो नहीं था, शहर ही था, लेकिन बहुत ही छोटा सा। हमारे इलाक़े में ऐसा था कि वहाँ सब लोग एक दूसरे को जानते थे। सभी आपस में मिलजुल कर रहते थे। कभी-कभी थोड़ी-बहुत लड़ाई-झगड़े हो जाते थे, लेकिन आमतौर पर सब शांतिपूर्वक रहते थे। साथ ही हमारा घर जिस इलाके में था, उसके ठीक पीछे एक बड़ा सा जंगल था। असल में, वो पूरा इलाका पहले जंगल हुआ करता था। लेकिन फिर लोगों ने वहाँ रहना शुरू कर दिया था। हमें भी वहाँ आए मुश्किल से 10-12 साल ही हुए थे। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन फिर ऐसा हुआ कि जिस लड़की से मैं प्यार करता था, उससे मेरा ब्रेकअप हो गया। ब्रेकअप के बाद मैं बहुत ज्यादा परेशान था। लगभग डिप्रेशन में ही चला गया था। न तो मेरा किसी से बात करने का मन करता था, न ही कहीं जाने का। बस मन करता था कि हर वक्त अकेला ही बैठा रहूँ। तो एक दिन मैंने अपने घर में कहा कि मैं अपने दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ और ये कहकर मैं उस जंगल में चला गया। पता नहीं मेरे सिर पर क्या भूत सवार था। मैं बस सबसे दूर, बहुत दूर चला जाना चाहता था। जहाँ मैं किसी को दिखूँ भी नहीं और कोई मुझसे बात भी न करे। अगर आप में से कोई इस स्थिति से गुजरा हो, तो आप समझ सकते हैं कि ऐसे में आपके दिमाग में कैसे-कैसे ख्याल चलते हैं। ऐसा नहीं था कि मैं जंगल में पहली बार गया था। मैं भी दोस्तों के साथ कई बार वहाँ घूमने जाता था। लेकिन उस दिन मैं बिल्कुल अकेला था। और मैं जंगल के बहुत अंदर तक चला जाना चाहता था, जहाँ कोई न हो, कोई मुझे न देखे। शाम का वक्त था। अंधेरा भी होने लगा था। लेकिन मेरे दिल में ज़रा सा भी डर नहीं था। मैंने सोचा था कि कुछ घंटे जंगल में बिताकर फिर घर वापस चला जाऊँगा। लेकिन मैं बस चलता गया। मेरे दिमाग में ना जाने कितने ख्याल चल रहे थे। आखिर में, मैं एक जगह जाकर रुक गया। वो जंगल का ऐसा इलाका था जहाँ मुझे नहीं लगता कि आज तक कोई आया भी होगा। वहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। मैं एक पेड़ के नीचे बैठ गया और अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचने लगा—कि मेरे साथ कितना बुरा हुआ, मैं कितना अकेला हूँ, और भी न जाने क्या-क्या। आज जब वो सब याद करता हूँ, तो लगता है कि मैं कितना बेवकूफ था। लेकिन असल में, वो उम्र ही ऐसी होती है। आप इतने भावुक हो जाते हो कि आपको लगता है बस यही आपकी ज़िंदगी है। मैं वहाँ बैठा ही था कि मुझे एक बहुत ही अजीब सा एहसास हुआ। ऐसा लगने लगा जैसे मेरे अलावा वहाँ और भी कोई है। जैसे कोई मुझे देख रहा है। आपने ये बात शायद बहुत बार सुनी होगी कि लोगों को ऐसा महसूस होता है कि कोई उन्हें देख रहा है। लेकिन यह बिलकुल सच बात है। ऐसा सच में होता है। मैंने झट से इधर-उधर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। ऊपर से अंधेरा भी लगभग हो चुका था। अचानक मेरे शरीर के सारे रोएँ खड़े हो गए। मेरी सारी इंद्रियाँ जैसे अलर्ट हो गईं। मैंने ध्यान से, धीरे-धीरे आस-पास की आवाजों को सुनने की कोशिश की। और तभी… मुझे वो आवाज़ सुनाई दी। एक अजीब-सी आवाज़…। एक बार को लगा शायद कोई गिलहरी होगी। लेकिन नहीं, वो आवाज़ भारी थी। मुझे लगा कहीं कोई बड़ा जंगली जानवर तो नहीं आ गया। लेकिन उस जंगल में मैंने कभी किसी बड़े जानवर के बारे में नहीं सुना था। फिर भी, मैं समझ गया था कि अब मुझे वहाँ से चले जाना चाहिए। मैं उठा और धीरे-धीरे वहाँ से जाने लगा। मैं मन ही मन खुद को समझा रहा था कि डरने की कोई बात नहीं है। जरूर कोई छोटा-मोटा जानवर होगा। हैरानी की बात ये थी कि उस वक्त मेरा सारा डिप्रेशन एकदम से गायब हो चुका था। उस वक्त बस मेरे दिमाग में एक ही ख्याल था—अपनी जान बचाने का। क्योंकि मैं जानता था कि वहाँ कुछ है। कुछ ख़तरनाक। और तभी, चलते-चलते मुझे पीछे से किसी ने आवाज़ दी—”ए!” मैंने पलटकर देखा, तो इस बार मुझे वो दिखाई दी। पेड़ों के बीच खड़ी थी। ऊपर से नीचे तक काले कपड़े पहने हुए। ऊपर से अंधेरा भी हो चुका था, इसलिए मुझे बस उसकी आकृति दिख रही थी। उसके बाल लंबे थे, लेकिन सफेद। जिससे पता चल रहा था कि वो कोई बहुत बूढ़ी औरत है। अब मैं आपको बिल्कुल सच बता रहा हूँ। तब तक की मेरी 16 साल की जिंदगी का वो पहला पल था, जब मैं इतना ज्यादा डरा था। यह उसका इलाका था। और मैंने वहाँ आकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी। फिर उसने एक हाथ उठाया और मुझे अपनी तरफ आने का इशारा करने लगी। मैं जानता था कि अगर मैं उसके पास गया, तो वो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगी। लेकिन अगर मैं नहीं गया, तो कहीं वो गुस्सा न हो जाए। मेरी नजरें अभी भी उसके चेहरे को ढूँढने में लगी थीं। मतलब, वो खड़ी तो मेरे सामने ही थी। लेकिन पेड़ों के बीच उसके चेहरे की आकृति समझने में वक्त लग रहा था। और फिर मुझे उसका चेहरा दिखा। बूढ़ा… झुर्रियों से भरा चेहरा। उसका चेहरा देखते ही मैं एकदम से अपने उस पैरालिसिस जैसे डर से बाहर निकला। और वहाँ से भागा। पूरी ताकत से। लेकिन भागते हुए भी ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे पीछे-पीछे आ रही है। पता नहीं कैसे, क्योंकि उसके भागने की आवाज़ तो नहीं आ रही थी। लेकिन मुझे पता था, वो मेरे पीछे है। मैं पागलों की तरह बस भागे जा रहा था। और फिर न जाने कितनी देर भागने के बाद मुझे सामने वो पुल दिखाई दिया, जिसके आगे हमारा इलाका पड़ता था। वो पुल करीब था, लेकिन फिर भी इतना दूर लग रहा था। मैं भागता रहा। मैंने उसे पलटकर देखा नहीं। लेकिन मुझे पता था कि वो अभी भी मेरे पीछे है। लेकिन मैंने जैसे-तैसे वो पुल पार कर लिया। लेकिन पुल पार करने के बाद भी मैं रुका नहीं। बस भागता रहा। जब तक मैं अपनी गली में नहीं पहुँच गया। हमारी गली में मेरे दोस्त का घर सबसे पहले पड़ता था। जबकि हमारा घर काफी आगे था। और उस वक्त उसका घर का दरवाजा भी खुला था। इसलिए मैं सीधा उसी के घर में जाकर घुस गया। उसके पापा घर पर ही थे। मैं इस हालत में पहुँचा, तो वो भी हैरानी से पूछने लगे कि मुझे क्या हुआ है। लेकिन मैं कुछ भी बताने की हालत में नहीं था। फिर मेरा दोस्त और उसके पापा मुझे मेरे घर तक छोड़ने आए। मेरी ऐसी हालत देखकर मेरे घर वाले भी परेशान हो गए। आसपास के और लोग भी इकट्ठा हो गए थे। सब पूछ रहे थे कि क्या हुआ है। मैंने सबको पूरी बात बता दी। मेरी बात सुनकर कुछ लोग हैरान थे, लेकिन कुछ हँस भी रहे थे। मेरे घर वाले भी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि मुझे कोई धोखा हुआ है। लेकिन हैरानी की बात ये थी कि मेरे दोस्त के जो पापा थे, वो बहुत ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे। उन्हें मेरी बात पर यकीन था। असल में, वो लोग वहाँ सबसे पहले रहने वाले लोगों में से थे। उनके पापा ने बताया कि उन्होंने पहले भी उस बूढ़ी औरत के बारे में सुना है। वो उस जंगल की डायन है। जो पता नहीं, कब से उस जंगल में ही रह रही है। मेरे घर वालों ने मुझे पानी-वानी पिलाकर शांत किया और पड़ोसी भी वहाँ से चले गए। पता नहीं वो बूढ़ी औरत कौन थी। अगर वो कोई ज़िंदा औरत थी, तो वो इतनी तेजी से मेरे पीछे कैसे आ सकती थी? और वो जंगल में अकेली क्यों रहती थी? वो मेरी नजरों का धोखा तो नहीं थी। लेकिन उस दिन के बाद मुझे ये समझ आ गया कि चाहे आप कितने ही डिप्रेशन में क्यों न हों, कितने ही परेशान क्यों न हों, किसी भी हालत में आपकी जान से बढ़कर और कुछ नहीं होता। hindi horror story teller, bhoot video, bhoot story, real ghost story in india in hindi, real ghost stories in hindi
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